हृदय के भाव: 1 कुरिन्थियों 10

 हृदय के भाव 

(1 कुरिन्थियों 10)


जब हम कोई काम करते हैं तो हमारे दिल में दो अलग-अलग भावनाएँ होती हैं, एक है कि जैसा हमें बताया जाता है वैसा करना, मुस्कुराकर सह लेना, भले ही हम ऐसा करना न चाहते हों, लेकिन दूसरी भावना बिलकुल अलग है कि जो काम हमें करने चाहिए थे, उन्हें करने के लिए तत्पर और उत्सुक रहना, बिना इस बात पर पछतावे के कि हम क्या करना चाहते थे।

जैसा कि मेरे एक अच्छे दोस्त कहते हैं कि जब हम किसी काम के बारे में ऐसा कहते हैं “क्या मुझे करना चाहिए?' तो इसके बजाय हमें कहना चाहिए कि 'क्या मैं कर सकता हूँ?"

हृदय की इच्छाओं को बदलना संभव

हाँ, अपने हृदय की इच्छाओं को बदलना संभव है।

पौलुस ने कुरिन्थियों को निर्देश दिए कि ऐसा कैसे किया जाए। उसने कहा, "ये बातें उदाहरण के रूप में घटित हुईं ताकि हम अपना मन बुरी बातों की ओर न लगाएँ, जैसा उन्होंने [जंगल में इस्राएलियों ने] किया था।" (1 कुरिन्थियों 10:6)। आइए हम अपने मन को परमेश्वर के वचन में पढ़े गए उदाहरणों से भरें ताकि हमारे हृदय हमारे प्रभु परमेश्वर की सेवा करने के लिए उत्तरदायी और तत्पर बन सकें।


Quote from Bro.Roberts Prins- Author of "Thinky Things" Hindi Translation by: Bro. Arvind