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हबक्कूक अध्याय 2
परमेश्वर को सुनना
हम कितनी बार प्रार्थना में परमेश्वर से कुछ मांगते हैं, और फिर अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ जाते हैं, और फिर भी अपनी तरह से हालात को ठीक करने की कोशिश करते रहते हैं?
"मैं अपने पहरे पर खड़ा रहूंगा, और गुम्मट पर चढ़ कर ठहरा रहूंगा, और ताकता रहूंगा कि मुझ से वह क्या कहेगा? और मैं अपने दिए हुए उलाहने के विषय में उत्तर दूं?" (हबक्कूक 2:1)
हमें भी वही करना चाहिए जो हबक्कूक ने किया था। हबक्कूक जानबूझकर परमेश्वर से जवाब का इंतज़ार कर रहा था। वह ध्यान से सुन रहा था कि परमेश्वर उसके सवाल का जवाब दें। जब हबक्कूक परमेश्वर से जवाब का इंतज़ार कर रहा था, तो वह एक खास जगह पर गया था, लेकिन हमारे लिए वह जगह कहीं भी हो सकती है। जब हम परमेश्वर से कोई सवाल पूछते हैं, तो जवाब का इंतज़ार करने के लिए धैर्य रखना बहुत ज़रूरी है और परमेश्वर जिस भी तरह से हमसे बात करें, उसे सुनने के लिए खुद को तैयार रखना चाहिए।
ऐसा लगता है कि हबक्कूक ने परमेश्वर की आवाज़ सुनी थी। हम भी अपनी ज़िंदगी की परिस्थितियों में, उसके वचन को पढ़कर, किसी दोस्त की बातों से, किसी गाने से, या किसी और तरीके से परमेश्वर की आवाज़ सुन सकते हैं। लेकिन क्या हम सच में सुनने के लिए समय निकालते हैं?
हम कितने बदतमीज़ होते हैं जब हम सवाल पूछते हैं लेकिन जवाब सुनने के लिए समय नहीं निकालते!
आइए हबक्कूक की तरह बनें और ध्यान से सुनें कि परमेश्वर हमसे क्या कहना चाहते हैं।
आइए हम सुनें कि परमेश्वर क्या कहना चाहते हैं और उनकी बात मानें।
Quoted from: Hindi Translation:
"Thinky Things" Bro. Robert Prins Bro.Arvind Kumar
Christadelphians Correspondence Center, Delhi NCR,North India
christadelplhiansdelhi@gmail.com