एक व्यापारी
के विषय में एक कहानी है जो प्रतिदिन एक भूमिगत पैदल पार पथ से जाया करता था। वह
स्वचलित सीढियों से ऊपर सड़क तक जाता था और सड़क के कोने तक पैदल चलता था जहाँ वह
एक छोटे लड़के से अखबार खरीदता था ये लड़का चिल्लाकर अखबार बेचता था “पेपर ! पेपर !” अखबार
लेकर यह व्यक्ति मुस्कराता था और लड़के को पैसे देकर उसको धन्यवाद बोलता था। वह
लड़का कभी नही मुस्कराता था और न ही धन्यवाद का उत्तर देता था और न ही कभी बख्शीस
के लिए आभार व्यक्त करता था। उस व्यक्ति का सहयात्री प्रतिदिन इस घटना को देखता
था और एक दिन उसने व्यपारी व्यक्ति से पूछा,”माफ कीजिए लेकिन प्रतिदिन मैं आपको देखता हूँ कि आप उस छोटे लड़के से अखबार
खरीदते है। आप हमेशा उसे मुस्कराकर धन्यवाद देते है लेकिन वह कभी भी आपकी परवाह
नही करता। वह केवल आपसे पैसा लेता है और फिर आवाज लगाने लगता है “पेपर ! पेपर !” आप क्यों
उस ढींढ बच्चे से इतना अच्छा व्यवहार करते हो?” व्यपारी व्यक्ति ने आश्चर्यभरी दृष्टि से देखकर उत्तर दिया,” मैं उस छोटे लड़के से व्यवहार सीखना नही चाहता।“ हममें से कितने ऐसे लोग है जो इस नियम पर चलते है कि
यदि आप मुझसे अच्छा व्यवहार करते है तो मैं भी आपसे अच्छा व्यवहार करूंगा और
यदि आप मुझे नजरअंदाज करते है तो मैं भी आपको नजरअंदाज करूंगा? क्यों हम लोगों को यह अवसर दे कि वे हमें व्यवहार
करना सिखाये? क्या यीशु ने नही कहा कि,”जैसे तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारे साथ व्यवहार
करें तुम भी उनके साथ वैसा ही करो।“ (मत्ती 7v12) उन्होंने यह नही कहा कि,” तुम भी उनसे वैसे ही व्यवहार करो जैसा वे तुमसे करते है बल्कि जैसा तुम चाहते
हो कि वे तुम्हारे साथ व्यवहार करें।
यदि हम दूसरों के व्यवहार के अनुसार अपनी
प्रतिक्रिया दें तो वे हमारे मालिक है। ऐसी स्थिति में हम उनके हाथों की कठपुतली
है। और जैसे वे हमसे कराना चाहते है वैसा ही हम करते है। यदि दूसरे लोगों का हमारे
कार्यो पर नियन्त्रण है तो हम कैसे प्रभु को प्रसन्न कर सकते है?
प्रभु यीशु मसीह आगे कहते है,” कि यदि तुम अपने प्रेम रखने वालों के साथ प्रेम रखो, तो तुम्हारी क्या बडाई? क्योंकि पापी भी अपने प्रेम रखने वालों के साथ प्रेम रखते है।“ (मत्ती 5v46)
हमें बताया गया है कि अपराधी भी अपनी माता से प्रेम
करते है। यह अच्छी बात है कि वे ऐसा करते है और जैसे वे अपनी माता से प्रेम करते
है वैसे ही वे अपने शत्रुओं से भी प्रेम करें। उच्च नैतिकता वाले जिस आचरण का
हमें अनुकरण करना है यह संसार उससे अज्ञात नही है, लेकिन प्रभु यीशु मसीह जो हमसे करने को कह रहे है निश्चित ही संसार में उसका
विस्तार नही हुआ है। ये शरीर प्रतिक्रिया देता है लेकिन शिष्य होने के नाते हमें
क्रिया करनी चाहिए। इस संसार की तुलना में, जो अपने मित्रों से प्रेम करता है, हमें अपने शत्रुओं से प्रेम करना चाहिए। आओ हम प्रभु यीशु मसीह के इन निर्देशों
को सुने, “जो कोई
तुझ से मांगे, उसे दे; और जो तेरी वस्तु छीन ले, उस से न मांग। और जैसा तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारे साथ करें, तुम भी उन के साथ वैसा ही करो। यदि तुम अपने प्रेम
रखने वालों के साथ प्रेम रखो, तो तुम्हारी क्या बडाई? क्योंकि पापी भी अपने प्रेम रखने वालों के साथ प्रेम रखते है। और यदि तुम
अपने भलाई करने वालों ही के साथ भलाई करते हो, तो तुम्हारी क्या बडाई? क्योंकि पापी भी ऐसा ही करते है। और यदि तुम उन्हें उधार दो, जिन से फिर पाने की आशा रखते हो तो तुम्हारी क्या
बडाई? क्योंकि पापी पापियों को उधार देते है, कि उतना ही फिर पायें। बरन अपने शत्रुओं से प्रेम रखो, और भलाई करो; और फिर पाने की आस न रखकर उधार दो; और तुम्हारे लिए बडा़ फल होगा और तुम परम प्रधान के सन्तान ठहरोंगे, क्योंकि वह उन पर जो धन्यवाद नही करते और बुरों पर
भी कृपालु है। जैसा तुम्हारा पिता दयावन्त है, वैसे ही तुम भी दयावन्त बनो।“
इसलिए याद रखिए कि हमें किसी छोटे लड़के से या किसी
अन्य से व्यवहार सिखने की आवश्यकता नही है। प्रभु यीशु ने हमें सिखाया है कि ,”जैसा तुम्हारा पिता दयावन्त है, वैसे ही तुम भी दयावन्त बनो; दोष मत लगाओ; तो तुम पर भी दोष नही
लगाया जाएगा; दोषी न ठहराओ, तो तुम भी दोषी नही ठहराए जाओगे; क्षमा करो, तो तुम्हारी भी क्षमा की
जाएगी। दिया करो, तो तुम्हें भी दिया
जाएगा; लोग पूरा नाप दबाकर और हिला हिलाकर, ओर उभरता हुआ तुम्हारी गोद में डालेंगे, क्योंकि जिस नाप से तुम नापते हो, उसी से तुम्हारे लिये भी नापा जाएगा।“
इसलिए दयावन्त होने का अर्थ है उन पर दया करना जो
इसके योग्य नही है, शत्रुओं के प्रति उद्वार
होना और दूसरों पर दोष ना लगाना जो दया परमेश्वर ने हम पर की है वही दया हमें
दूसरों के साथ करनी है अब चाहे वह एक अखबार बेचने वाला छोटा लड़का ही क्यों न हो।
तभी हमें बडा फल मिलेगा और हम परम प्रधान की सन्तान ठहरेंगे।